समन्दर

"बार-बार आकर वो साहिल से टकराता था, बिखरता था, और फिर लौट जाता था. बड़ा शांत सा रहता था ऐसे तो वो, पर रह-रह कर कुछ बेचैन सा हो जाता था." ... "कुछ तो चल रहा होता था उसके अंदर, जो रूह तक वो उसे भिगोना चाहता था. इज़हारे-ए-मोहब्बत कर रहा हो मानो वो कुछ [...]